Tuesday, 25 March 2014

*मेरी गुड्डी*


कोई झकझोर जब जाता है उसे,
खिलखिलाकर हँसती जाती है...
गुड्डी भी हमारी थोड़ी पागल है,
जब रोना होता है तब मुसकुराती है ।
कभी हाथ मरोड़ता है, कभी बाल खींचता है ज़माना,
कभी गर्दन दबाओ तो गीत गा कर सुनाती है...
गुड्डी भी हमारी थोड़ी पागल है,
जब रोना होता है तब मुसकुराती है ।
मैं सोचती हूँ कभी कि पूछूं उससे,
क्या दर्द नहीं होता उसे
अकेले में रोना नहीं आता?
जब भी पूछने के लिए उसके पास जाती हूँ
वो आँखें झपकाती है और सरक कर दूर चली जाती है
 गुड्डी भी हमारी थोड़ी पागल है,
जब रोना होता है तब मुसकुराती है ।
जब भी माँ को देखती हूँ दुनिया से अकेले लड़ते,
चुप-चाप सारे जख्म सहते,
मुझे गुड्डी की याद आती है...
जब दिल में दर्द होता है तो सर दर्द का बहाना बनाती है
माँ भी मेरी गुड्डी जैसी हैं,
जब रोना होता है तब मुसकुराती हैं । 

2 comments:

  1. Maa, maa hoti hai,
    sab kuch sunti, sehti...
    par kuchh nahi kehti hai !!

    Maa, maa hoti hai !!


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