Tuesday, 25 March 2014

*वो सूखा दरख्त*

वो सूखा दरख्त खुशनसीब है मुझसे कहीं ज्यादा
लोग घूरते तो नहीं लालची निगाहों से उसे,  
नज़र भी नहीं लगती उसे किसी की ।

तोड़ते नहीं पत्ते टहनियाँ उसकी
 तोड़ते हैं लोग मेरे दिल को जिस तरह ।
नहीं चढ़ती लताएँ उसपे, चूसने को उसके जिस्म का नूर।
नहीं आते परिंदे उसपे , जलाने उसको... सुनाके अपने इश्क़ की दास्तान ।

 है भले ही अकेला पर खुश होगा ज़रूर; हवाओं का संगीत सुनता होगा...
हम तो लोगों के तानों से नवाज़े जाते है यहाँ ।
तनहाई इतनी भी बुरी नहीं जान गया होगा; खुद ही खुद से गुफ्तगू करते करते ।
हम तो खुद से क्या किसी से भी नहीं कर पाते बातें,
इलज़ाम है हमारी ज़ुबान पे... मनहूसियत का।
कट जाएगा फिर भी वो एक दिन।
काटे जाएंगे हम भी यहाँ ।
ये महफिल, ये तनहाई, ये मुस्कान, ये रुसवाई, बहाने हैं फकत ज़िंदा रहने के ...

आखिर इक दिन झुकना सबको होता है कटना सबको होता है मरना सबको होता है ।

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