वो सूखा
दरख्त खुशनसीब है मुझसे कहीं ज्यादा
लोग
घूरते तो नहीं लालची निगाहों से उसे,
नज़र भी
नहीं लगती उसे किसी की ।
तोड़ते
नहीं पत्ते टहनियाँ उसकी
तोड़ते हैं लोग मेरे दिल को जिस तरह ।
नहीं
चढ़ती लताएँ उसपे, चूसने को
उसके जिस्म का नूर।
नहीं
आते परिंदे उसपे , जलाने
उसको... सुनाके अपने इश्क़ की दास्तान ।
है भले ही अकेला पर खुश होगा ज़रूर; हवाओं का संगीत सुनता होगा...
हम तो
लोगों के तानों से नवाज़े जाते है यहाँ ।
तनहाई
इतनी भी बुरी नहीं जान गया होगा; खुद ही खुद से गुफ्तगू करते करते ।
हम तो
खुद से क्या किसी से भी नहीं कर पाते बातें,
इलज़ाम है हमारी ज़ुबान पे... मनहूसियत का।
कट
जाएगा फिर भी वो एक दिन।
काटे
जाएंगे हम भी यहाँ ।
ये
महफिल, ये तनहाई, ये मुस्कान, ये रुसवाई, बहाने
हैं फकत ज़िंदा रहने के ...
आखिर इक दिन झुकना सबको होता है… कटना सबको होता है… मरना सबको
होता है ।
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