बड़ी कमाल की चीज़ बनाई है बनाने वाले ने... धूप।
सर्दियों की भीनी सुनहरी धूप का तो कहना ही क्या, मोहब्बत में रूठे यार सी होती है-
हम आँखें बिछाये बैठे रहते हैं और वो लुका-छिपी खेलती रहती है। कभी शक्ल भर दिखा
कर चली जाती है कभी चढ़ती है दोपहर तक प्यार के नशे की मानिंद।
गर्मियों की धूप को भी कम न आँकिए मगर। इसकी जरूरत आशिकों से पूछिये।
स्कूल और कॉलेज के आशिकों का तो ये धूप ही सहारा है। भरी दुपहरी में क्रिकेट खेलते
अब्दुल को देख ज़ोया की आंखो की चमक देखिये... या फिर छुट्टी होने के बाद स्कूल बस
की ओर भागते बच्चो के बीच शिखा और वत्सल की हर कदम के बाद और धीमी होती हुई चाल देखिये...
भई धूप ने किसी और का किया हो या न हो आशिकों का बहुत भला किया है।
जब सारा जमाना गर्मी और धूप को कोसता अपने घरों में AC और cooler
में बैठा TV से चिपका होता है, ये आशिक
गलियों, मुहल्लों, पार्कों में इश्क की
नई इबारत लिखा रहे होते हैं। हाथों में हाथ डाले इस जलाती हुई धूप और जलते हुये
जमाने को पीछे छोड़, अपनी नयी दुनिया के सपने सजाते हैं।
हाँ है तो मेरा भी एक किस्सा धूप का... मिलने बुलाया था उन्होने
हमें। पहली बार। भरी दुपहरी में। फिर उस दोपहर उन्होने मुझे अपने इश्क़ की दास्तान
सुनाई।
कोई खास मुश्किल हुई नहीं हमें उन्हे भुलाने में। भई हम तो आदी ही थे
हमेशा से, तन्हा
जीने के। बस वो धूप याद आती है अक्सर। बड़ा सुकून था उस धूप में भी उस दिन। आखिरी
मुलाकात ही सही, मिलना तो हुआ था। मुक्कमल हुआ था मेरा इश्क़
उस दिन।
आते वक्त तक साँझ हो गयी थी। थके हुए परिंदों और भूले भटके मुसाफिरों
की तरह हम भी थके भारी कदमों से घर लौट आए थे। मैंने महसूस किया था पसीना उस दोपहर, आंखो के आसपास, गालों पर... जाता रहा वो भी धूप जाते जाते।
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